Search More in This Blog

Saturday, 6 February 2021

Reducing Product Damage in a Global Supply Chain. - ppt download

Reducing Product Damage in a Global Supply Chain. - ppt download: About ShockWatch, Inc. ─ Founded: 1974 ─ Headquarters: Dallas, Texas ─ Distribution: Global ─ Solutions: Indicators & recorders covering major environmental conditions: impact, tilt, temperature, vibration & pressure ─ Customers: 2/3 of the Fortune 100 & 1/2 of the Fortune 1000 ─ Markets:  White Goods  Furniture  Industrial  Defense/Aerospace  Pharmaceutical  Food  Energy  Communication Systems  Electronics  Medical Equipment

Monday, 17 June 2019

#क्षत्रिय_महिलाएं_भी_वीरता_में_पुरुषों_से_कम_नही


                             
            Image may contain: 3 people

राजपूतो में स्त्रियों का बड़ा आदर होता है, ओर राजपूत स्त्रिया भी वीरपत्नी या वीरमाता कहलाने में खुद को गोरवान्वित महसूस करती थी !! उन वीरांगनाओं का पतिव्रत धर्म , शूरवीरता ओर साहस तो जगतविख्यात है । इसके ना जाने कितने असंख्य उदारहण इतिहास है मौजूद है ।
इसकी कुछ घटनाओ का जिक्र में करती हूँ, जब राजा दाहिर वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे, ओर कासिम ने सिंध पर अधिकार कर लिया, तो दाहिर का एक पुत्र डरकर बिना युद्ध किये भाग आया ! लेकिन दाहिर की पत्नी कुछ हजार सैनिको के साथ मिलकर पहले तो कुछ समय लड़ी, लेकिन वाद में पराजय बिल्कुल नजदिग देखकर उन्होंने जोहर किया !!
महाराणा रायमल के पुत्र पृथ्वीराज की पत्नी का अपने पति के साथ जाकर पठानों से युद्ध करना तो जगत विख्यात है ।
रायसेन का राजा सलहदी तंवर जब बहादुरशाह गुजराती के साथ युद्ध मे हारकर जब मुसलमान हो गया , तो बहादुरशाह ने तोपों से उसके गढ़ पर हमला करना शुरू कर दिया ! तब मुसलमान बने उस पूर्व राजपूत ने कहा आप स्त्रियों और बच्चो को ना सताएं , में अंदर जाकर उन्हें समझाता हूँ, की वो इस्लाम ग्रहण करें !!
अंदर दुर्गावती उनकी पत्नी, जो राणा सांगा की पुत्री थी, उसने अपनी पति की बात सुनते ही उसे धिक्कारना शुरू किया !! " ऐसी निर्ज्जता से तो मर जाना ही अच्छा है, खुद हाथों में तलवार लेकर उसने अपने पति और उस मुसलमान अफसर का सिर धड़ से अलग कर दिया, जो साथ मे अंदर आया था, बाद में उस वीरांगना ने जोहर किया !! जोहर का पालन भी दुर्गावती ने कायरतापूर्वक प्राण त्यागकर नही किया था !! पहले 100 सगे संबंधियों के साथ वो मुसलमानो से खूब लड़ी ! हजारो मस्तक काट के जोहर की अग्नि में प्रवेश किया !!
मारवाड़ के राजा जसवंतसिंह जब ओरेंगेजब से युद्ध हारकर आये थे, तो उनकी पत्नियों ने अपने कक्ष का दरवाजा तक उनके लिए नही खोला था, उनका साफ कहना था, राजपूत स्त्रियां केवल " विजय या वीरगति " में ही विश्वास रखती है !!
रानी पद्मिनी ने भी कोई जोहर आसानी से हथियार डालकर नही किया था, रति के समान सुंदर उन कोमल कन्या ने 3 दिन तक खड्ग ढाल उठाकर कई मल्लेछो को मौत के घाट उतारा था !!
यह राजपूतो में पर्दे की प्रथा थी ही नही !! राजमहल में वो सिंहनी की भांति अपने पति के साथ बराबर में आकर बेठती थी ! यह प्रथा तो मुसलमानो की कुद्रष्टि उनपर नही पड़े , इसलिए चल पड़ी ! हिन्दुओ को चरित्र कभी इतना गिरा हुआ नही था, की स्त्रियां पर्दे के पीछे रहें !!

Saturday, 15 June 2019

वक्त_है_बदलाव_का

Share and Subscribe if agreed.


Image may contain: 1 person, standing


मैं नहीं सिखा पाऊँगी अपनी बेटी को बर्दाश्त करना एक ऐसे आदमी को जो उसका सम्मान न कर सके।
कैसे सिखाए कोई माँ अपनी फूल सी बच्ची को कि पति की मार खाना सौभाग्य की बात है?
मैंने तो सिखाया है कोई एक मारे तो तुम चार मारो।
हाँ, मैं बेटी का घर बिगाड़ने वाली बुरी माँ हूँ, .........
लेकिन नहीं देख पाऊँगी उसको दहेज के लिए बेगुनाह सा लालच की आग में जलते हुए।
मैं विदा कर के भूल नहीं पाऊँगी, अक्सर उसका कुशल पूछने आऊँगी। हर अच्छी-बुरी नज़र से, ब्याह के बाद भी उसको बचाऊँगी।
बिटिया को मैं विरोध करना सिखाऊँगी।
ग़लत मतलब ग़लत होता है, यही बताऊँगी। देवर हो, जेठ हो, या नंदोई, पाक नज़र से देखेगा तभी तक होगा भाई।
ग़लत नज़र को नोचना सिखाऊँगी, ढाल बनकर उसकी ब्याह के बाद भी खड़ी हो जाऊँगी।
“डोली चढ़कर जाना और अर्थी पर आना”, ऐसे कठिन शब्दों के जाल में उसको नहीं फसाऊँगी।
बिटिया मेरी पराया धन नहीं, कोई सामान नहीं जिसे गैरों को सौंप कर गंगा नहाऊँगी।
अनमोल है वो अनमोल ही रहेगी।
रुपए-पैसों से जहाँ इज़्ज़त मिले ऐसे घर में मैं अपनी बेटी नहीं ब्याहुँगी।
औरत होना कोई अपराध नहीं, खुल कर साँस लेना मैं अपनी बेटी को सिखाऊँगी।
मैं अपनी बेटी को अजनबी नहीं बना पाऊँगी।
हर दुःख-दर्द में उसका साथ निभाऊँगी, ज़्यादा से ज़्यादा एक बुरी माँ ही तो कहलाऊँगी।
#वक्त_है_बदलाव_का 






Monday, 13 May 2019

तुम_छेड़ो__हम_देखेंगे!


Image may contain: one or more people

#तुम_छेड़ो__हम_देखेंगे!"
___________________
दिन दहाड़े, खुली सड़क पर #बलात्कार होता है और लोग कुछ नहीं करते. क्या इस पर हमें हैरान होना चाहिए? जब #द्रौपदी की साड़ी उतारी गयी थी, तब भी कहां किसी ने कुछ किया था!
दिन दहाड़े, खुली सड़क पर बलात्कार होता है और हम सोचते हैं कि लोग कुछ नहीं करते.......
नहीं रे बहुत कुछ करते हैं.. #वीडियो बनाते हैं, तकनीक ने लोगो के हाथ में ये जो #खिलौनाथमा दिया है, उसका इस्तेमाल तो करना ही होगा ना. कभी #अश्लील वीडियो देख कर, तो कभी अश्लील वीडियो बना कर।
सरे आम इस तरह रेप हो सकता है, ये पढ़ कर रूह कांप उठती है. सोचो अगर आप वहां होते तो क्या करते, तो लोग जवाब भी यही देते हैं कि हम किसी #पंगे में नहीं पड़ेंगे, चुपचाप वहां से निकल जाएंगे.
यह किस तरह के समाज में जी रहे हैं हम? छोटी मोटी #छेड़छाड़ को नजरअंदाज करते करते आज खुले आम सड़क पर बलात्कार की स्थिति पैदा हो गयी है।
यानि एक महिला होने के नाते अगर आप आवाज उठा दें, तो कभी आप अपने #घर का, कभी #समाज का, तो कभी देश का नाम #बदनाम कर रही हैं. लेकिन जो लोग आप के साथ ये हरकत कर रहे हैं या हो रही हरकत को देख कर नजरअंदाज कर देते हैं, उनका इस बदनामी में कोई योगदान नहीं है।
इस तरह की #टिप्पणियों से लोगों की यह दलील भी समझ में आने लगती है कि वे #बेटियों के पैदा होने से इसलिए डरते हैं कि आखिर उनकी #हिफाजत कौन करेगा. एक बच्ची की मां को पल पल उसकी हिफाजत की चिंता लगी रहती है. जब कोई उसे #गोद में उठाता है, तो माँ की नजरें उनकी #उंगलियों को ध्यान से देख रही होती हैं।
सरकार #बेटी_बचाओ__बेटी_पढ़ाओ के सिर्फ नारे ही दे सकती है. लेकिन जब तक लोगों की #मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक कोई सरकार किसी बेटी को नहीं बचा सकेगी. और मानसिकता तो यही है:----
"तुम छेड़ो, हम देखेंगे."

www.educatererindia.com 

जो कर सको तो इतना करना


Image result for fighter girl

करने की हिम्मत है तो सरे रास्ते खुल जाते हैं
अरे ओ लड़कियो
जो कर सको तो इतना करना,
कि तुम्हारी अगली आने वाली नस्लों की हर बेटी को,
खिलौने के नाम पर बस किचन सेट ना मिले,
तुम उन्हें भी बंदूकों से खेलने देना।
जो कर सको तो इतना करना,
कि चाहे रोटी गोल बनाना ना सिखा सको उसको,
जूडो कराटे सिखा देना,
ताकि आँखों में आँखें डाल मुँह नोच सके वो,
वहशी हैवानों, दरिंदों का।
सुनो लड़कियों,
जब माँ बनो बरसों बाद,
तो याद करना वो सारे लम्हें,
जब माँ ने मुँह फेर लेने को कहा था,
जब दादी ने किसी से ना कहने को कहा था,
जब आँखों ही आँखों में दी घुड़की से सहमी थी तुम,
जब किसी अधेड़ ने बेशर्मी से हँसते हुए छुआ था,
उन अनगिनत लम्हों को बेबाकी से गिना देना तुम,
आने वाली नस्ल के हर ‘नर’ और बेटियों को,
ताकि बेटियाँ चुप ना रहना सीखें,
ताकि नर, बेटे बनना सीखें,
तुम इन लम्हों को यूँ ही ज़ाया मत होने देना।
और कर सको तो ये भी करना,
कि जब तुम्हारा लाडला चिराग,
थोड़ी सी चोट खाकर रोने लगे,
तो कोई ये ना कहे उसको,
‘लड़की है क्या? बात बात पर रो देता है’
सुनो तुम उसे रोना ज़रूर सिखा देना।
जो कर सको तो अपने लाडले के कॉलेज के पहले दिन ही,
समझाना उसे बिठा, बेझिझक और बेबाक
कि उसकी और उसके जैसे लाडलों की
माँओं, चाचियों और दीदियों ने क्या सहा है,
उनको किसने, कैसे, कब और कहाँ जबरदस्ती छुआ है,
तुम उसे इस नस्ल के मर्दों सा मत होने देना।
सुनो लड़कियों,
जो कर सको तो इतना करना,
कि टोक सको अपने प्रेमियों, पिताओं और भाइयों को हर गाली पर,
कि किसी से कपड़ों से उसकी तरफ़ बढ़ने से हिचकें तुम्हारे दोस्त,
कि अनसुना ना करो अपने बेटे के दोस्तों के मजाक,
कि आटा, सब्जियों और चावल की मात्रा तय करने तक ना रह जाये तुम्हारी भूमिका घर में,
जो कर सको तो इतना करना,
कि हमारी आने वाली नस्ल बेहतर बन सके,
कि आने वाली दुनिया इतनी घिनौनी ना हो,
कि बेटियों के लिए अभ्यारण्य ना बनाने पड़ें,]
कि इंसानियत हर पल घुटती ना हो।
अरे ओ लड़कियो कर सको तो इतना करलो
कि हो सके तो इस दुनिया को अपने लायक बना लेना


हाँ मालूम हैं मुझे अपने अधिकार


Image may contain: one or more people and text


आज के युग मे औरत कमज़ोर नही होती उसको अपने जीवन मे बोलने का अपनी जीवन मे खुश रहने का पूरा हक हैं !
हाँ हूँ मैं शिक्षित 
#हाँ मालूम हैं मुझे अपने अधिकार 
हाँ जानती हूँ मैं कि शोषण करने वाले से बड़ा गुनहगार सहने वाला होता हैं .....
कई बार कदम रखती हूँ देहलीज के बाहर कि आवाज़ उठाऊ शोषण के खिलाफ ,
पर याद आ जाता हैं कि ....
मैं एक महान और सिद्धांतवादी पिता की बेटी हूँ
मैं एक आदर्शवादी माँ की बेटी हूँ
मैं समाज में अपनी प्रतिष्ठा बनाएँ भाई की बहन हूँ
मैं अपनी प्यारी भतीजियों की प्यारी बुआ हूँ
फिर कैसे मैं अपनी वजह से उनके दामन में दाग लग़ा दूँ ,इसलिये अक्सर कदम रुक जाते हैं ....
हाँ मैं अपने अधिकार जानती हूँ पर चुप हूँ क्योंकि
मैं एक बेटी हूँ ,बहन हूँ ,बुआ हूँ और शायद दो घरों की इज्जत हूँ बस यही मेरी कमजोरी हैं पर कमज़ोर नहीँ हूँ मैं ......!!
"बेटियाँ खुद टूट जाती है ,पर अपने मा -बाप का मान नही टूटने देती



Sunday, 12 May 2019

अरे बुढिया तू यहाँ न आया कर


Image may contain: 1 person, text


“ अरे बुढिया तू यहाँ न आया कर , तेरा बेटा तो चोर-डाकू था, इसलिए गोरों ने उसे मार दिया“
जंगल में लकड़ी बिन रही एक मैली सी धोती में लिपटी बुजुर्ग महिला से वहां खड़ें भील ने हंसते हुए कहा .
“ नही चंदू ने आजादी के लिए कुर्बानी दी हैं “ बुजुर्ग औरत ने गर्व से कहा।
उस बुजुर्ग औरत का नाम #जगरानी_देवी था और इन्होने पांच बेटों को जन्म दिया था, जिसमे आखरी बेटा कुछ दिन पहले ही शहीद हुआ था।
उस बेटे को ये माँ प्यार से चंदू कहती थी और दुनियां उसे “ आजाद “ जी हाँ ! #चंद्रशेखर_आजाद के नाम से जानती हैं।
हिंदुस्तान आजाद हो चुका था , आजाद के मित्र #सदाशिव_राव एक दिन आजाद के माँ-पिता जी की खोज करतें हुए उनके गाँव पहुंचे।
आजादी तो मिल गयी थी लेकिन बहुत कुछ खत्म हो चुका था।
चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत के कुछ वर्षों बाद उनके पिता जी की भी मृत्यु हो गयी थी।
आज़ाद के भाई की मृत्यु भी इससे पहले ही हो चुकी थी।
अत्यंत निर्धनावस्था में हुई उनके पिता की मृत्यु के पश्चात आज़ाद की निर्धन निराश्रित वृद्ध माताश्री उस वृद्धावस्था में भी किसी के आगे हाथ फ़ैलाने के बजाय जंगलों में जाकर लकड़ी और गोबर बीनकर लाती थी तथा कंडे और लकड़ी बेचकर अपना पेट पालती रहीं।
लेकिन वृद्ध होने के कारण इतना काम नहीं कर पाती थीं कि भरपेट भोजन का प्रबंध कर सकें।
कभी ज्वार कभी बाज़रा खरीद कर उसका घोल बनाकर पीती थीं क्योंकि दाल चावल गेंहू और उसे पकाने का ईंधन खरीदने लायक धन कमाने की शारीरिक सामर्थ्य उनमे शेष ही नहीं थी।
शर्मनाक बात तो यह कि उनकी यह स्थिति देश को आज़ादी मिलने के 2 वर्ष बाद (1949 ) तक जारी रही।
#चंद्रशेखर_आज़ाद जी को दिए गए अपने एक वचन का वास्ता देकर #सदाशिव जी उन्हें अपने साथ अपने घर झाँसी लेकर आये थे, क्योंकि उनकी स्वयं की स्थिति अत्यंत जर्जर होने के कारण उनका घर बहुत छोटा था अतः उन्होंने आज़ाद के ही एक अन्य मित्र #भगवान_दास_माहौर के घर पर आज़ाद की माताश्री के रहने का प्रबंध किया था और उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा की।
मार्च 1951 में जब आजाद की माँ जगरानी देवी का झांसी में निधन हुआ तब सदाशिव जी ने उनका सम्मान अपनी माँ के समान करते हुए उनका अंतिम संस्कार स्वयं अपने हाथों से ही किया था।
आज़ाद की माताश्री के देहांत के पश्चात झाँसी की जनता ने उनकी स्मृति में उनके नाम से एक सार्वजनिक स्थान पर पीठ का निर्माण किया।
प्रदेश की तत्कालीन सरकार (प्रदेश में कंग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे गोविन्द बल्लभ पन्त) ने इस निर्माण को झाँसी की जनता द्वारा किया हुआ अवैध और गैरकानूनी कार्य घोषित कर दिया।
किन्तु झाँसी के नागरिकों ने तत्कालीन सरकार के उस शासनादेश को महत्व न देते हुए चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित करने का फैसला कर लिया।
मूर्ति बनाने का कार्य चंद्रशेखर आजाद के ख़ास सहयोगी कुशल शिल्पकार #रूद्र_नारायण_सिंह जी को सौपा गया। उन्होंने फोटो को देखकर आज़ाद की माताश्री के चेहरे की प्रतिमा तैयार कर दी।
जब सरकार को यह पता चला कि आजाद की माँ की मूर्ती तैयार की जा चुकी है और सदाशिव राव, रूपनारायण, भगवान् दास माहौर समेत कई क्रांतिकारी झांसी की जनता के सहयोग से मूर्ती को स्थापित करने जा रहे है तो उसने अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापना को देश, समाज और झाँसी की कानून व्यवस्था के लिए खतरा घोषित कर उनकी मूर्ति स्थापना के कार्यक्रम को प्रतिबंधित कर पूरे झाँसी शहर में कर्फ्यू लगा दिया।
चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात कर दी गई ताकि अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति की स्थापना ना की जा सके।
जनता और क्रन्तिकारी आजाद की माता की प्रतिमा लगाने के लिए निकल पड़ें।
अपने आदेश की झाँसी की सडकों पर बुरी तरह उड़ती धज्जियों से तिलमिलाई तत्कालीन सरकार ने अपनी पुलिस को सदाशिव को गोली मार देने का आदेश दे डाला
किन्तु आज़ाद की माताश्री की प्रतिमा को अपने सिर पर रखकर पीठ की तरफ बढ़ रहे सदाशिव को जनता ने चारों तरफ से अपने घेरे में ले लिया।
जुलूस पर पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया।
सैकड़ों लोग घायल हुए, दर्जनों लोग जीवन भर के लिए अपंग हुए और कुछ लोग की मौत भी हुईं।
(हालांकि मौत की पुष्टि नही हुईं )
चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित नहीं हो सकी।
आजाद हम आपको कौन से मुंह से आपको श्रद्धांजलि दें ?
जब हम आपकी माताश्री की 2-3 फुट की मूर्ति के लिए उस देश में 5 फुट जमीन भी हम न दे सकें।
जिस देश के लिए आप ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया